हिंदू परंपरा में गाय केवल एक पशु नहीं — वह पवित्रता का जीवंत स्वरूप है। गौमाता सभ्यता की पोषिका हैं: उनका दूध पोषण देता है, उनकी उपस्थिति घर को पावन करती है, और उनकी सेवा को समस्त सृष्टि की सेवा के समान माना गया है।
बहुत समय तक गोपालन की यह पुण्य परंपरा हिंदू घरों से हटकर संस्थागत गौशालाओं तक सिमट गई — ऐसे स्थान, जो चाहे कितने ही सद्भाव से चलें, एक परिवार और उनकी पवित्र गाय के बंधन की बराबरी कभी नहीं कर सकते। गुरुदेव का आह्वान मूल की ओर लौटने का है: हर परिवार को गौशाला की आवश्यकता नहीं। हर परिवार को आवश्यकता है एक गाय की — एक जीवंत पावन उपस्थिति की, जो नित्य सेवा के माध्यम से बच्चों को धर्म सिखाती है।

